वाराणसी। जन्माष्टमी के अगले दिन देशभर में दही-हांडी उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। इस वर्ष जन्माष्टमी 4 सितंबर को मनाई गई, जिसके अगले दिन यानी 5 सितंबर को दही-हांडी उत्सव की रौनक देखने को मिल रही है। ढोल-नगाड़ों, भजन-कीर्तन और भगवान श्रीकृष्ण के जयकारों के बीच गोविंदाओं की टोलियां मानव पिरामिड बनाकर ऊंचाई पर लटकी मटकी फोड़ती हैं। लेकिन दही-हांडी सिर्फ एक रोमांचक खेल नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और उनके गहरे जीवन संदेश से जुड़ी परंपरा है।
कृष्ण की बाल लीला से जुड़ी है परंपरा
धार्मिक मान्यता के अनुसार बाल्यकाल में कान्हा अपने सखाओं के साथ गोकुल और वृंदावन की गलियों में माखन-दही की मटकी फोड़कर माखन चुराया करते थे। गोपियां माखन बचाने के लिए मटकी को जमीन से काफी ऊंचाई पर लटका देती थीं, लेकिन कान्हा अपने सखाओं के साथ मिलकर मानव पिरामिड बनाते और मटकी तक पहुंच जाते थे।
सबसे ऊपर पहुंचकर श्रीकृष्ण मटकी फोड़ते और उसमें रखा माखन-दही अपने सखाओं के साथ बांटकर खाते थे। इसी बाल लीला की स्मृति में दही-हांडी की परंपरा आज भी उत्साह के साथ निभाई जाती है।
कैसे मनाया जाता है दही-हांडी उत्सव?
दही-हांडी में एक मटकी को दही, मक्खन और अन्य सामग्री से भरकर ऊंचाई पर रस्सी के सहारे लटकाया जाता है। इसके बाद युवाओं की टोलियां, जिन्हें गोविंदा कहा जाता है, एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर मानव पिरामिड बनाती हैं और मटकी फोड़ने का प्रयास करती हैं।
मटकी फूटते ही चारों ओर श्रीकृष्ण के जयकारे गूंज उठते हैं। ढोल-नगाड़ों और भजन-कीर्तन से माहौल भक्तिमय हो जाता है। कई स्थानों पर दही-हांडी प्रतियोगिताओं में विजेता टीमों के लिए आकर्षक पुरस्कार भी रखे जाते हैं।
मटकी फोड़ने के पीछे छिपा है गहरा संदेश,मंथन से निर्मल होता है मन
दूध से दही और दही के मंथन से मक्खन निकलता है। इसी तरह दही-हांडी की परंपरा यह संदेश देती है कि जीवन में संघर्ष और आत्ममंथन के बाद ही मनुष्य के भीतर की अच्छाई और निर्मलता सामने आती है।
माखन को पवित्र और निर्मल हृदय का प्रतीक माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण का ‘माखन चुराना’ इसी भाव से जोड़ा जाता है कि जो हृदय प्रेम, सरलता और पवित्रता से भरा हो, श्रीकृष्ण उसे अपना बना लेते हैं।
प्रेम और एकता का संदेश
श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में सबसे बड़ा संदेश प्रेम और मिलजुलकर रहने का दिखाई देता है। कान्हा माखन अकेले नहीं खाते थे, बल्कि अपने सखाओं, बछड़ों और बंदरों तक के साथ उसे बांटते थे।
दही-हांडी में भी मटकी तक पहुंचने के लिए हर गोविंदा को एक-दूसरे का सहारा बनना पड़ता है। कोई अकेला मटकी नहीं फोड़ सकता। यही मानव पिरामिड समाज को एकता, सहयोग और सामूहिक प्रयास की ताकत का संदेश देता है।
अहंकार का त्याग भी है प्रतीक
ऊंचाई पर लटकी मटकी तक पहुंचना केवल शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन नहीं है। यह इस बात का भी प्रतीक माना जाता है कि जीवन में लक्ष्य कितना ही कठिन क्यों न हो, सहयोग, धैर्य और विश्वास के साथ उसे हासिल किया जा सकता है।
इसलिए दही-हांडी में फूटने वाली मटकी के साथ केवल दही और माखन नहीं बिखरता, बल्कि प्रेम, भक्ति, एकता और सहयोग का संदेश भी लोगों तक पहुंचता है।
यही वजह है कि दही-हांडी को केवल खेल या उत्सव नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ी ऐसी परंपरा माना जाता है, जो आज भी समाज को मिलजुलकर आगे बढ़ने और हृदय को निर्मल रखने की प्रेरणा देती है।
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