नई दिल्ली। केंद्र सरकार न्यायाधिकरणों यानी Tribunals में अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। सरकार अगले सप्ताह लोकसभा में राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग (National Tribunals Commission) के गठन से जुड़ा विधेयक पेश कर सकती है। प्रस्तावित कानून का उद्देश्य न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, स्वतंत्र, एकरूप और विशेषज्ञता आधारित बनाना है। इसके तहत अलग-अलग ट्रिब्यूनलों में अध्यक्ष और सदस्यों के चयन से जुड़े कार्यों की जिम्मेदारी एक राष्ट्रीय आयोग को देने का प्रस्ताव है।

क्या है राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग का प्रस्ताव?

प्रस्तावित कानून में राष्ट्रीय राजधानी में मुख्यालय वाले एक स्वतंत्र राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है।

इस आयोग में कुल पांच सदस्य होंगे। इनमें:

  • एक अध्यक्ष
  • दो न्यायिक सदस्य
  • दो तकनीकी सदस्य शामिल होंगे।

इस व्यवस्था का मकसद न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों के लिए स्पष्ट और समान मानक तैयार करना है।

कौन बन सकता है आयोग का अध्यक्ष?

प्रस्तावित व्यवस्था के मुताबिक आयोग के अध्यक्ष पद के लिए सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश पात्र हो सकते हैं। इससे आयोग के नेतृत्व में न्यायिक अनुभव को प्राथमिकता देने की कोशिश की गई है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद सरकार का कदम

राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन का प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों से भी जुड़ा है। शीर्ष अदालत ने न्यायाधिकरणों की नियुक्ति और कामकाज में न्यायिक स्वतंत्रता तथा पारदर्शिता सुनिश्चित करने पर जोर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने एक स्वतंत्र और विशेषज्ञता वाले राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग की जरूरत बताई थी, जो विभिन्न ट्रिब्यूनलों के अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति के लिए पारदर्शी प्रक्रिया तैयार कर सके।

2021 के कानून में क्या हुआ था?

प्रस्तावित विधेयक में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के कुछ प्रावधानों को रद्द किया था। शीर्ष अदालत ने इन प्रावधानों को शक्तियों के पृथक्करण और न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना था। अदालत ने न्यायाधिकरणों के अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति, कार्यकाल और सेवा शर्तों से जुड़े प्रावधानों पर भी सवाल उठाए थे। अब सरकार नए कानून के जरिए इस पूरी व्यवस्था को अधिक स्पष्ट और संस्थागत रूप देने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

नए कानून में किन बातों का होगा प्रावधान?

प्रस्तावित न्यायाधिकरण सुधार विधेयक में सिर्फ नियुक्ति प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि अध्यक्षों और सदस्यों की सेवा से जुड़े कई पहलुओं को शामिल किया गया है।

इसमें मुख्य रूप से:

  • अध्यक्ष और सदस्यों की योग्यता
  • चयन प्रक्रिया
  • नियुक्ति की व्यवस्था
  • वेतन और भत्ते
  • इस्तीफे के नियम
  • पद से हटाने की प्रक्रिया
  • सेवा की अन्य शर्तें से जुड़े प्रावधान किए जाने का प्रस्ताव है।

नियुक्तियों में पारदर्शिता पर रहेगा जोर

सरकार का प्रस्तावित मॉडल न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों के लिए एक समान व्यवस्था तैयार करने पर केंद्रित है। अलग-अलग ट्रिब्यूनलों में नियुक्तियों को लेकर लंबे समय से योग्यता, प्रक्रिया और स्वतंत्रता से जुड़े सवाल उठते रहे हैं। राष्ट्रीय आयोग के जरिए इन प्रक्रियाओं में एकरूपता और पारदर्शिता लाने की कोशिश की जा रही है।

कानून बनने के बाद क्या बदलेगा?

अगर संसद से विधेयक पारित होकर कानून बनता है तो न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 समाप्त हो जाएगा। इसके स्थान पर प्रस्तावित नया कानून न्यायाधिकरणों में नियुक्ति और सेवा शर्तों से जुड़ी व्यवस्था को नियंत्रित करेगा। इससे अलग-अलग न्यायाधिकरणों में अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति के लिए एक केंद्रीय और संस्थागत प्रक्रिया विकसित होने की उम्मीद है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?

न्यायाधिकरणों का काम विभिन्न कानूनी और प्रशासनिक मामलों का निपटारा करना है। ऐसे संस्थानों में योग्य और स्वतंत्र अध्यक्षों तथा सदस्यों की नियुक्ति न्यायिक व्यवस्था की प्रभावशीलता के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। प्रस्तावित राष्ट्रीय आयोग के जरिए सरकार नियुक्तियों में योग्यता, विशेषज्ञता, पारदर्शिता और संस्थागत स्वतंत्रता को मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

एक नजर में समझें

  • विधेयक: राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग से जुड़ा प्रस्तावित कानून
  • कहां पेश होगा: लोकसभा
  • कब: अगले सप्ताह
  • प्रस्तावित आयोग: राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग
  • कुल सदस्य: 5
  • न्यायिक सदस्य: 2
  • तकनीकी सदस्य: 2
  • अध्यक्ष: 1
  • अध्यक्ष पद के लिए पात्रता: सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश
  • मौजूदा कानून: न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021
  • नए कानून का उद्देश्य: नियुक्तियों में पारदर्शिता, एकरूपता, विशेषज्ञता और स्वतंत्रता सुनिश्चित करना