किशोरावस्था में बढ़ता स्क्रीन समय बन रहा चिंता का विषय, नींद और एकाग्रता भी हो सकती है प्रभावित; पढ़ने की आदत विकसित करने के लिए अखबार को बनाया जा सकता है प्रभावी माध्यम
आज मोबाइल फोन बच्चों और किशोरों की दिनचर्या का अहम हिस्सा बन चुका है। पढ़ाई और जानकारी से लेकर मनोरंजन, खेल, वीडियो और सोशल मीडिया तक इसकी पहुंच है। लेकिन जरूरत से ज्यादा मोबाइल इस्तेमाल करने की आदत अब चिंता का कारण भी बन रही है। लंबे समय तक स्क्रीन पर नजर टिकाए रखने और देर रात तक मोबाइल चलाने का असर केवल आंखों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि नींद, एकाग्रता, शारीरिक सक्रियता, पढ़ाई और व्यवहार पर भी पड़ सकता है। खासकर किशोरावस्था में इस पर ध्यान देना अधिक जरूरी है, क्योंकि इसी समय बच्चे का शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और नैतिक विकास तेजी से होता है।
स्क्रीन पर टिकी नजरें, आंखों की सेहत पर बढ़ता दबाव
मोबाइल और अन्य डिजिटल स्क्रीन को लंबे समय तक लगातार देखने से आंखों में थकान, सूखापन, जलन, सिरदर्द और धुंधला दिखाई देने जैसी परेशानियां हो सकती हैं। स्क्रीन देखते समय पलकें कम झपकने और लगातार नजदीक की वस्तु पर ध्यान केंद्रित रखने से आंखों पर दबाव बढ़ सकता है। यदि बच्चों का अधिकांश खाली समय मोबाइल के साथ घर के भीतर ही गुजर रहा है तो बाहर खेलने और प्राकृतिक रोशनी में समय बिताने का अवसर भी घट जाता है।
ऐसे में अभिभावकों को बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल के दौरान नियमित अंतराल का ध्यान रखना चाहिए। मोबाइल के अलावा आउटडोर खेल, व्यायाम और दूसरी शारीरिक गतिविधियों को उनकी दिनचर्या में शामिल करना जरूरी है। मोबाइल पढ़ाई या जरूरी जानकारी का माध्यम हो सकता है, लेकिन उसका अनियंत्रित इस्तेमाल सामान्य दिनचर्या पर हावी नहीं होना चाहिए।
मन और व्यवहार पर भी असर, वास्तविक दुनिया से न टूटे बच्चों का जुड़ाव
किशोरावस्था में मोबाइल की अत्यधिक निर्भरता मानसिक और सामाजिक विकास के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। लगातार नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया पर दूसरों से तुलना और तेजी से बदलते छोटे वीडियो में उलझे रहने से बच्चों के लिए लंबे समय तक किसी एक काम पर ध्यान बनाए रखना कठिन हो सकता है। जब मोबाइल वास्तविक संवाद, खेल, पुस्तक पढ़ने और परिवार के साथ समय बिताने की जगह लेने लगे तो यह स्थिति चिंता बढ़ा सकती है।
मोबाइल का देर रात तक इस्तेमाल नींद की दिनचर्या को भी प्रभावित कर सकता है। पर्याप्त नींद न मिलने का असर अगले दिन पढ़ाई, एकाग्रता, मनोदशा और दैनिक गतिविधियों पर दिखाई दे सकता है। वहीं इंटरनेट के जरिए बच्चों के सामने सही और गलत दोनों तरह की सामग्री पहुंचती है। किशोरावस्था में जिज्ञासा अधिक होती है, लेकिन हर ऑनलाइन सामग्री की सत्यता और उसके संभावित प्रभाव को समझने की क्षमता विकसित हो रही होती है। इसलिए बच्चों को गलत सूचना, हिंसक या आयु-अनुपयुक्त सामग्री और ऑनलाइन दुर्व्यवहार से बचाने के साथ उनमें डिजिटल समझ विकसित करना भी जरूरी है।
मोबाइल से हटे नजर तो अखबार से जुड़े बच्चे, भाषा और ज्ञान दोनों होंगे मजबूत
डिजिटल स्क्रीन के बढ़ते प्रभाव के बीच बच्चों में अखबार पढ़ने की आदत विकसित करना एक सकारात्मक पहल हो सकती है। परिषदीय विद्यालयों में विद्यार्थियों को समाचार पत्र पढ़ने के लिए प्रेरित करने का उद्देश्य उन्हें केवल देश-दुनिया की घटनाओं से परिचित कराना नहीं, बल्कि नियमित पठन की आदत विकसित करने और भाषा पर उनकी पकड़ मजबूत करने से भी जुड़ा है।
अखबार पढ़ते समय बच्चा किसी समाचार या विषय को क्रमबद्ध तरीके से पढ़ता और समझता है। इससे वह नए शब्दों, वाक्य संरचना और अभिव्यक्ति के अलग-अलग तरीकों से परिचित होता है। नियमित समाचार-पठन सामान्य ज्ञान बढ़ाने के साथ बच्चों में किसी घटना को विस्तार से समझने और उसके अलग-अलग पहलुओं पर विचार करने की क्षमता विकसित करने में भी मदद कर सकता है।
विद्यालयों में अखबार को केवल पढ़वा देना ही पर्याप्त नहीं होगा। शिक्षक विद्यार्थियों से दिन की महत्वपूर्ण खबर चुनने, कठिन शब्दों के अर्थ खोजने, समाचार का सार अपने शब्दों में लिखने और किसी प्रमुख विषय पर कक्षा में चर्चा करने जैसी गतिविधियां करा सकते हैं। इससे समाचार पत्र भाषा, सामान्य ज्ञान, अभिव्यक्ति और तार्किक सोच के व्यावहारिक शिक्षण का उपयोगी माध्यम बन सकता है।
मोबाइल छीनना नहीं, सही इस्तेमाल सिखाना है सबसे जरूरी
बच्चों को मोबाइल से पूरी तरह दूर कर देना आज के डिजिटल दौर में व्यावहारिक समाधान नहीं है। तकनीक शिक्षा, सूचना और संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुकी है। जरूरत इस बात की है कि बच्चे मोबाइल का इस्तेमाल कब, कितना और किस उद्देश्य से कर रहे हैं, इस पर परिवार और विद्यालय दोनों स्तर पर ध्यान दिया जाए।
अभिभावक घर में स्वयं भी उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं। भोजन के दौरान मोबाइल से दूरी, पढ़ाई के समय गैर-जरूरी नोटिफिकेशन बंद रखना, सोने से पहले स्क्रीन से विराम और प्रतिदिन कुछ समय अखबार या पुस्तक पढ़ने जैसी आदतों को परिवार की दिनचर्या का हिस्सा बनाया जा सकता है। बच्चों को केवल मोबाइल कम चलाने की हिदायत देने के बजाय उनके सामने खेल, पुस्तक, अखबार, परिवार के साथ बातचीत और रचनात्मक गतिविधियों के बेहतर विकल्प रखना ज्यादा प्रभावी हो सकता है।
स्क्रीन और वास्तविक जीवन में संतुलन से संवरेगा बचपन
तकनीक के इस दौर में सबसे बड़ी चुनौती मोबाइल को बच्चों के जीवन से खत्म करना नहीं, बल्कि उसका जिम्मेदार और संतुलित इस्तेमाल सिखाना है। मोबाइल ज्ञान और पढ़ाई का साधन बने, लेकिन वह नींद, खेल, पुस्तक, अखबार, परिवार और सामाजिक संवाद की जगह न ले।
किशोरों के जीवन में डिजिटल दुनिया और वास्तविक दुनिया के बीच जितना बेहतर संतुलन बनेगा, उनके शारीरिक स्वास्थ्य, एकाग्रता, पढ़ने की क्षमता, संवाद और व्यक्तित्व विकास के लिए उतना ही बेहतर वातावरण तैयार होगा। ऐसे में विद्यालयों में अखबार पढ़ने की संस्कृति विकसित करना बच्चों को स्क्रीन से कुछ समय दूर रखने के साथ उन्हें भाषा, जानकारी और विचारों की दुनिया से जोड़ने का भी सार्थक माध्यम बन सकता है।
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